निस्वार्थ प्रेम, पूर्ण समर्पण एवं अटूट विश्वास से ही मजबूत होता है गुरु-शिष्य का संबंध : रिटायर्ड कर्नल एच. एस. गुलेरिया

NIRANKARI SATSANG TOHANA

टोहाना। स्थानीय संत निरंकारी सत्संग भवन में रविवार को आयोजित विशाल आध्यात्मिक सत्संग में संत निरंकारी मंडल, दिल्ली के मेंबर इंचार्ज (प्रचार-प्रसार विभाग) आदरणीय रिटायर्ड कर्नल एच. एस. गुलेरिया जी ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि सद्गुरु और भक्त का संबंध संसार के सभी रिश्तों से श्रेष्ठ है, क्योंकि इसकी नींव निस्वार्थ प्रेम, पूर्ण समर्पण एवं अटूट विश्वास पर आधारित होती है। सद्गुरु अपने भक्त को कहीं ले जाने का कार्य नहीं करते, बल्कि उसके जीवन में व्याप्त अज्ञान, अहंकार एवं विकारों के अंधकार को ज्ञान के प्रकाश में परिवर्तित कर देते हैं।

उन्होंने कहा कि सद्गुरु अपने भक्त से सदैव निष्काम प्रेम करते हैं, जबकि मनुष्य का प्रेम अनेक बार स्वार्थ और अपेक्षाओं से जुड़ जाता है। यदि गुरु के प्रति प्रेम में शर्तें या स्वार्थ जुड़ जाएं तो वह प्रेम नहीं रह जाता। इसलिए सच्ची भक्ति वही है, जिसमें पूर्ण समर्पण, निष्काम भाव और गुरु के प्रत्येक वचन पर अटूट विश्वास हो।

अपने प्रेरक उद्बोधन में उन्होंने कहा कि गुरु-सिख वही है, जो परिस्थितियाँ कैसी भी हों, सद्गुरु के आदेशों एवं शिक्षाओं पर दृढ़ बना रहे। भगवान श्रीराम एवं लक्ष्मण के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जीवन में अनेक बार परिस्थितियाँ और लोगों के कटु शब्द हमारी आस्था को डिगाने का प्रयास करते हैं, लेकिन सच्चा भक्त वही है जो किसी भी स्थिति में गुरु के बताए मार्ग से विचलित नहीं होता।

रिटायर्ड कर्नल गुलेरिया जी ने कहा कि समर्पण आधा-अधूरा नहीं हो सकता। जैसे ईमानदारी, निष्ठा और वफादारी पूर्ण होती है, उसी प्रकार गुरु के प्रति श्रद्धा भी संपूर्ण होनी चाहिए। गुरु के वचनों को बिना किसी संशय के जीवन में अपनाना ही वास्तविक समर्पण है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे केवल ज्ञान सुनने तक सीमित न रहें, बल्कि उसे अपने व्यवहार एवं जीवन का हिस्सा बनाएं।

उन्होंने विश्वास और श्रद्धा का अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि विश्वास भक्ति की शुरुआत है, जबकि श्रद्धा उसकी पूर्णता है। जब गुरु के प्रत्येक वचन को तर्क-वितर्क से ऊपर उठकर जीवन में उतार लिया जाता है, तभी भक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करती है।

प्रवचन के दौरान उन्होंने शानू शाह का प्रेरक प्रसंग सुनाते हुए बताया कि सच्चा प्रेम किसी लेन-देन का नाम नहीं है। गुरु को हमारे धन या वस्तुओं की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि वे हमारे अहंकार, स्वार्थ और विकारों का त्याग चाहते हैं। जो भक्त गुरु पर पूर्ण भरोसा रखता है, वह हर परिस्थिति में उनकी कृपा का अनुभव करता है।

उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि प्रत्येक श्रद्धालु सद्गुरु की शिक्षाओं को अपने जीवन में अपनाते हुए प्रेम, विनम्रता, सहनशीलता, सेवा, भाईचारा एवं मानवता के मूल्यों को व्यवहार में उतारे। यही सच्ची भक्ति है और यही मानव जीवन की सार्थकता भी है।

सत्संग के अंत में आदरणीय रिटायर्ड कर्नल एच. एस. गुलेरिया जी ने टोहाना की संगत द्वारा मिले स्नेह एवं सम्मान के लिए आभार व्यक्त करते हुए कहा कि संगत के दर्शन एवं चरण-धूलि प्राप्त करना उनके लिए सौभाग्य की बात है। उन्होंने सद्गुरु माता सुदीक्षा जी महाराज की असीम कृपा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए सभी श्रद्धालुओं के उज्ज्वल एवं आध्यात्मिक जीवन की मंगलकामना की।

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