कांवड़ यात्रा : आध्यात्मिकता में फैलती फूहड़ता

कांवड़ यात्रा : आस्था, अनुशासन और शुचिता की यात्रा में बढ़ता दिखावा

कांवड़ यात्रा सनातन हिन्दू परंपरा की उन पवित्र धार्मिक यात्राओं में से है, जिसमें श्रद्धालु गंगाजल लेकर भगवान शिव का जलाभिषेक करने के लिए कठिन यात्रा करते हैं। यह केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक गंगाजल ले जाने की यात्रा नहीं है, बल्कि आस्था, संकल्प, संयम, तप, सेवा और भगवान शिव के प्रति समर्पण की यात्रा है।

kanvad yatra

लेकिन समय के साथ इस पवित्र परंपरा के स्वरूप में कुछ ऐसे परिवर्तन दिखाई देने लगे हैं, जिन पर समाज के प्रबुद्ध वर्ग, अभिभावकों और धार्मिक नेतृत्व को गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

पहले कांवड़ में श्रद्धा का भार था, आज कई जगह प्रदर्शन का भार बढ़ गया
मुझे अपने जीवन काल में अब तक कई वर्षों तक कांवड़ यात्रा को देखने का अवसर मिला, पहले कांवड़ यात्रा का स्वरूप काफी अलग दिखाई देता था। अधिकांश श्रद्धालु सरलता से कांवड़ लेकर चलते थे। एक ओर गंगाजल का लोटा होता था और दूसरी ओर भगवान शिव की मूर्ति, चित्र अथवा पूजा से संबंधित कोई प्रतीक।

कांवड़ का उद्देश्य स्पष्ट था—गंगाजल लेकर जाना, भगवान शिव को अर्पित करना और श्रद्धा के साथ अपनी धार्मिक यात्रा पूर्ण करना।
उस समय लगभग हर कांवड़िए के चेहरे पर थकान के साथ-साथ श्रद्धा, अनुशासन और संकल्प दिखाई देता था। यात्रा में कठिनाई थी, लेकिन उस कठिनाई को सहने का उद्देश्य आत्मसंयम और भक्ति था।

आज भी लाखों कांवड़िए पूरी श्रद्धा और अनुशासन के साथ यात्रा करते हैं। इसलिए यह कहना बिल्कुल उचित नहीं होगा कि पूरी कांवड़ यात्रा का स्वरूप बदल गया है। आज भी असंख्य श्रद्धालु निष्ठा, नियम और भक्ति के साथ कांवड़ लेकर चलते हैं।

चिंता केवल उस प्रवृत्ति को लेकर है, जिसमें भक्ति की जगह प्रदर्शन, साधना की जगह प्रतियोगिता और श्रद्धा की जगह उग्रता दिखाई देने लगती है।
कांवड़ जितनी बड़ी, क्या भक्ति भी उतनी ही बड़ी?

आज कहीं-कहीं ऐसी कांवड़ें दिखाई देती हैं जिनका भार इतना अधिक होता है कि उन्हें उठाकर चलना तो दूर, सीढ़ियां चढ़ना भी कठिन हो जाता है।
मन में सहज प्रश्न उठता है—क्या भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कांवड़ का अत्यधिक भारी होना आवश्यक है?

kanvad yatra 1

यदि एक साधारण लोटे में लाया गया गंगाजल सच्ची श्रद्धा से शिवलिंग पर अर्पित किया जाए तो क्या उसका आध्यात्मिक मूल्य कम हो जाएगा?
धर्म का मूल्य भार, आकार, शोर या प्रदर्शन से नहीं, बल्कि भावना, श्रद्धा और आचरण से निर्धारित होना चाहिए।

यदि कांवड़ का भार इतना बढ़ जाए कि श्रद्धालु का शरीर ही उसे ढो न पाए, तो हमें एक बार रुककर यह सोचना चाहिए कि कहीं हमने साधना को प्रदर्शन की प्रतियोगिता तो नहीं बना दिया है।

कांवड़ यात्रा में शारीरिक कठिनाई का अपना महत्व है। पैदल चलना, तप सहना, नियमों का पालन करना और अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखना साधना का हिस्सा हो सकता है।
लेकिन स्वेच्छा से कठिनाई सहना और शरीर को अनावश्यक कष्ट देकर धार्मिक श्रेष्ठता प्रदर्शित करना—दो अलग बातें हैं।

भगवान शिव त्याग, वैराग्य, संयम और करुणा के प्रतीक हैं। इसलिए उनकी आराधना में भी संयम और मर्यादा का स्थान सर्वोच्च होना चाहिए।
गीता में भी मनुष्य के आचरण में विवेक, संयम और शास्त्रसम्मत मार्गदर्शन के महत्व पर बल दिया गया है। शास्त्र-विरुद्ध, अहंकारपूर्ण और स्वयं को कष्ट देकर किए जाने वाले उग्र आचरण को धर्म की कसौटी पर परखना आवश्यक है।

kanvad

फूहड़ नाच-गाना और नशा—क्या यही धार्मिक यात्रा की पहचान हो?

एक और चिंता का विषय है कि कुछ स्थानों पर धार्मिक यात्रा के साथ अत्यधिक तेज संगीत, अश्लील या फूहड़ नृत्य, नशे का सेवन, हुड़दंग और सार्वजनिक व्यवस्था को बाधित करने जैसी प्रवृत्तियां जुड़ती जा रही हैं।
यहां फिर स्पष्ट करना जरूरी है कि संगीत, भजन, जयकारे और उत्साह धार्मिक यात्रा का स्वाभाविक हिस्सा हो सकते हैं।

समस्या उत्साह में नहीं है।
समस्या तब शुरू होती है जब उत्साह उन्माद बन जाए, भक्ति दिखावा बन जाए और धार्मिक यात्रा मनोरंजन अथवा शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बन जाए।
कांवड़ यात्रा में “हर-हर महादेव” का जयघोष मन को ऊर्जा देता है। शिव भक्ति में भजन और कीर्तन भी अत्यंत सुंदर परंपरा हैं। लेकिन नशे में धुत होकर नाचना, राहगीरों को परेशान करना, यातायात बाधित करना या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना किसी भी प्रकार से शिवभक्ति का पर्याय नहीं हो सकता।

असली कांवड़िया कौन?
असली कांवड़िया वह नहीं जिसकी कांवड़ सबसे बड़ी हो।

असली कांवड़िया वह है—
जो यात्रा के नियमों का पालन करे।
जो अपने माता-पिता का सम्मान करे।
जो रास्ते में किसी वृद्ध, महिला या बच्चे को परेशान न करे।
जो स्वच्छता बनाए रखे।
जो नशे से दूर रहे।
जो अपने साथ चल रहे दूसरे श्रद्धालु की सहायता करे।
जो कठिनाई में भी धैर्य रखे।
जो गंगाजल को पवित्र समझे।

और सबसे महत्वपूर्ण—जो भगवान शिव की भक्ति को अपने चरित्र और व्यवहार में उतारे।
यदि कांवड़ यात्रा पूरी करने के बाद व्यक्ति पहले से अधिक विनम्र, संयमी, सेवाभावी और सदाचारी बनता है तो उसकी यात्रा सफल है।
लेकिन यदि यात्रा के बाद अहंकार, हिंसा, नशा, उग्रता और दूसरों के प्रति असम्मान बढ़ जाए तो हमें अपनी यात्रा के उद्देश्य पर विचार करना चाहिए।
माता-पिता की जिम्मेदारी सबसे बड़ी है

यह प्रश्न केवल प्रशासन या पुलिस से पूछने का नहीं है।
यह प्रश्न हर परिवार से पूछा जाना चाहिए।
क्या माता-पिता अपने बच्चों को धार्मिक यात्रा पर भेजते समय केवल यह देखते हैं कि उनका बच्चा कांवड़ लेकर गया या नहीं?
या वे यह भी देखते हैं कि वह किस प्रकार यात्रा कर रहा है, किन लोगों के साथ है, क्या कर रहा है और किस उद्देश्य से कर रहा है?

आज के माता-पिता को अपने बच्चों को धर्म का अर्थ समझाने की आवश्यकता है। उन्हें बताना होगा कि धर्म का अर्थ केवल धार्मिक प्रतीक धारण करना नहीं है। धर्म का अर्थ है—सत्य, संयम, सेवा, करुणा, शुचिता और मर्यादा।

हिन्दू समाज के सामने एक बड़ी चुनौती
हमारे समाज में अनेक धार्मिक यात्राएं, पर्व और आयोजन होते हैं। करोड़ों लोग उनमें श्रद्धा से भाग लेते हैं। लेकिन हिन्दू समाज के सामने एक संरचनात्मक समस्या भी है।

किसी एक केंद्रीय, सर्वमान्य धार्मिक संस्था, बोर्ड या आचार-संहिता निर्धारण करने वाली ऐसी व्यवस्था का अभाव है जो सभी धार्मिक आयोजनों के लिए आधुनिक परिस्थितियों के अनुरूप स्पष्ट सामाजिक और धार्मिक मर्यादाएं तय कर सके।
परिणाम यह होता है कि युवा अक्सर देखादेखी करते हैं।

किसी ने बड़ी कांवड़ बनाई तो दूसरे ने उससे बड़ी बनाने की कोशिश की।
किसी ने तेज संगीत लगाया तो दूसरे ने उससे अधिक तेज संगीत लगाया।
किसी ने प्रदर्शन किया तो दूसरे ने उससे बड़ा प्रदर्शन करने की कोशिश की।
धीरे-धीरे श्रद्धा में प्रतियोगिता और प्रतियोगिता में प्रदर्शन शामिल हो जाता है।
यही प्रवृत्ति केवल कांवड़ यात्रा तक सीमित नहीं है। धार्मिक जुलूसों, शोभायात्राओं, त्योहारों और अन्य धार्मिक आयोजनों में भी इसका प्रभाव दिखाई देता है।
क्या धार्मिक स्वतंत्रता के साथ धार्मिक अनुशासन नहीं होना चाहिए?

धार्मिक स्वतंत्रता हमारी महत्वपूर्ण सामाजिक और संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा है। लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ अनुशासनहीनता नहीं हो सकता।
हमें ऐसी सामुदायिक आचार-संहिता की आवश्यकता है जिसमें धार्मिक भावना का सम्मान करते हुए यह बताया जाए कि—
• धार्मिक यात्रा में नशे का स्थान नहीं होना चाहिए।
• फूहड़ता और अश्लीलता को धार्मिक उत्सव का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए।
• सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान नहीं पहुंचाया जाना चाहिए।
• यातायात और आम नागरिकों के अधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए।
• स्वच्छता और पर्यावरण का ध्यान रखा जाना चाहिए।
• अत्यधिक शारीरिक जोखिम पैदा करने वाले अनावश्यक प्रदर्शन से बचना चाहिए।
• बच्चों और युवाओं को धर्म के साथ संस्कार और जिम्मेदारी भी सिखाई जानी चाहिए।
• धार्मिक यात्रा को सेवा, सद्भाव और अनुशासन का माध्यम बनाया जाना चाहिए।

ऐसी व्यवस्था किसी धर्म-विरोधी सोच का परिणाम नहीं होगी, बल्कि धर्म की गरिमा को बचाने का प्रयास होगी।
हमें कांवड़ यात्रा को बदलना नहीं, उसकी आत्मा को बचाना है
कांवड़ यात्रा हमारे समाज की जीवंत धार्मिक परंपरा है। यह लाखों लोगों को जोड़ती है। गरीब-अमीर, गांव-शहर और विभिन्न सामाजिक वर्गों के लोग एक साथ भगवान शिव की भक्ति में चलते हैं।
इस यात्रा में सेवा शिविर लगते हैं। लोग निःशुल्क भोजन और पानी देते हैं। चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई जाती है। रास्ते में अजनबी लोग एक-दूसरे की मदद करते हैं।

यह पक्ष हमारी धार्मिक संस्कृति की अद्भुत शक्ति है।
इसलिए कांवड़ यात्रा की आलोचना नहीं होनी चाहिए; उसके भीतर प्रवेश कर रही विकृतियों पर आत्ममंथन होना चाहिए।

हमें कांवड़ को रोकना नहीं है।
हमें कांवड़ की पवित्रता बचानी है।
हमें युवाओं को धर्म से दूर नहीं करना है।
हमें उन्हें धर्म का वास्तविक अर्थ समझाना है।
हमें उत्साह समाप्त नहीं करना है।
हमें उत्साह को अनुशासन और मर्यादा से जोड़ना है।

अब समाज को भी अपनी भूमिका निभानी होगी
सरकार और प्रशासन कानून-व्यवस्था बनाए रख सकते हैं। पुलिस सुरक्षा दे सकती है। प्रशासन व्यवस्थाएं कर सकता है।
लेकिन धार्मिक संस्कार पुलिस नहीं सिखा सकती।
यह काम परिवार, समाज और धार्मिक नेतृत्व को करना होगा।
माता-पिता को अपने बच्चों से बात करनी होगी।
धार्मिक संस्थाओं को युवाओं के लिए मार्गदर्शन देना होगा।

समाज के प्रभावशाली और प्रबुद्ध लोगों को चुपचाप तमाशा देखने के बजाय सकारात्मक भूमिका निभानी होगी।
और स्वयं युवाओं को भी यह समझना होगा कि भगवान शिव के भक्त होने का सबसे बड़ा प्रमाण यह नहीं है कि उनकी कांवड़ कितनी विशाल है, बल्कि यह है कि उनका चरित्र कितना विशाल है।

आज आवश्यकता किसी धार्मिक यात्रा को बदनाम करने की नहीं, बल्कि उसके मूल स्वरूप को बचाने की है।
आइए, हम ऐसी कांवड़ यात्रा की कल्पना करें जिसमें गंगाजल हो, भगवान शिव के प्रति अटूट श्रद्धा हो, पैरों में यात्रा की थकान हो, माथे पर भक्ति का भाव हो, मन में संयम हो और व्यवहार में सेवा।

कांवड़ छोटी हो या बड़ी—भक्ति बड़ी होनी चाहिए।
जयकारा ऊंचा हो, लेकिन चरित्र उससे भी ऊंचा हो।
यात्रा कठिन हो, लेकिन आचरण मर्यादित हो।
हर-हर महादेव।

Leave a Comment

Sign In

Register

Reset Password

Please enter your username or email address, you will receive a link to create a new password via email.